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गणपति-उत्सव के अवसर रामदयालु सिंह कॉलेज में आयोजित स्वराज्य-पर्व में बाल गंगाधर तिलक के विचारों की प्रासंगिकता पर राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित

–भारत और भारतीय राष्ट्रीयता को स्थापित बनाये रखने के लिये हमें सदा ही तिलक की आवश्यकता रहेगी : डॉ. अनिल कुमार ओझा
 मुजफ्फरपुर (वरुण कुमार)। स्वराज्य के प्रणेता लोकमान्य तिलक के चिंतन की प्रासंगिकता पर विचार करने का अर्थ है वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य की चुनौतियों से पार पाने के लिये उनके चिंतन से कोई राह मिलती है या नहीं। मैं समझता हूं कि तिलक का जितना बहुआयामी और ऐतिहासिक योगदान था, वैसा प्रमुखता का स्थान उन्हें हमारे इतिहास और राष्ट्रीय जीवन में नहीं मिला है। स्वराज्य-पर्व के अवसर पर ‘बाल गंगाधर तिलक के विचारों की प्रासंगिकता ‘ विषय पर रामदयालु सिंह कॉलेज के श्रीकृष्ण सभागार में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के मुख्य वक्ता और राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार ओझा ने ये विचार रखे। उन्होंने आगे कहा कि अपनी लेखनी के कारण तिलक जी को बार-बार राष्ट्रद्रोह की सज़ा भोगनी पड़ी। गांधीजी ने तिलक जी को आधुनिक भारतीय का निर्माता और जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें भारतीय शांति का जनक कहा था। वे सही अर्थों में भारत के पहले जननायक थे, जिन्हें समूचा देश तिलक महाराज कहता था। तिलक और गोखले ने ही मिल कर डेक्कन एजुकेशनल सोसायटी बनायी, जिसके तहत फर्ग्यूसन कॉलेज बना। तिलक शिवाजी को मराठी अस्मिता के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता के प्रतीक के रूप में स्थापित कर रहे थे। तिलक मानते थे कि राष्ट्रीय एकता के लिये भाषायी एकता आवश्यक है, इसलिये उन्होंने इसके लिये प्रयास किये। मुजफ्फरपुर बम कांड से लेकर बम्बई के प्लेग के बारे में अपने अखबार में लगातार लिखने के कारण उन्हें बार-बार सज़ा दी गयी, लेकिन तिलक की कलम रोकी नहीं जा सकी। तिलक जी को महाराष्ट्र या देश में उतना मज़बूत संगठन नहीं मिला, जैसा गांधी जी को मिला था। तिलक के राजनीतिक विचारों की आज भी प्रासंगिकता है। भारत और भारतीय राष्ट्रीयता को स्थापित बनाये रखने के लिये हमें सदा ही तिलक की आवश्यकता रहेगी।
रामदयालु सिंह कॉलेज के इतिहास विभाग के प्रोफेसर श्री वीरेन्द्र सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि लोकमान्य तिलक का व्यक्तित्व बहुआयामी है। राष्ट्र की समुन्नति के लिये उनके चिन्तन और योगदान को देखते हुए उनको एक सच्चे कर्मयोगी की संज्ञा दी जा सकती है। तिलक ने सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता के लिये, प्रकृति और संस्कृति को जोड़ने के लिये सामूहिक रूप से गणपति उत्सव मनाने की शुरुआत की। इसी प्रकार अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने और अपने राष्ट्र के प्रति आत्मगौरव जगाने के लिये तिलक जी ने शिवाजी उत्सव की शुरुआत की। गीता-रहस्य और ओरायन जैसे ग्रन्थों की रचना उनकी ऐतिहासिक देन है। इन ग्रन्थों के माध्यम से तिलक जी ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्रचलित विचारों और चिन्तन पद्धतियों को एक नयी दृष्टि दी और राष्ट्रीय चेतना को समृद्ध किया।
बाबासाहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष श्री अजित कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि कुछ लोग इतिहास पढ़ते हैं, कुछ इतिहास गढ़ते हैं। लोकमान्य तिलक ऐसे ही हमारे इतिहास निर्माता हैं। दिनकर जी ने संस्कृति के चार अध्याय लिखे। आज किसी ऐसे इतिहासकार की ज़रूरत है जो आगे बढ़ कर संस्कृति  के पांचवें अध्याय का लेखन करे। बाल गंगाधर तिलक महाराष्ट्र से थे। महाराष्ट्र में वीरता और शौर्य का अगर कोई आधुनिक प्रतीक ढूंढें तो वे शिवाजी हैं। अंग्रेजी हुकूमत हो या मुगलों का शासन, उनकी कोशिश थी कि भारत को जाति और सम्प्रदाय के इतने टुकड़ों में बांट दिया जाये कि वह सदा कमज़ोर बना रहे। पहले शिवाजी ने राष्ट्रीय एकता के लिये समेकित प्रयास किये और इसकी दुबारा शुरुआत करने का श्रेय लोकमान्य तिलक को है, जब उन्होंने गणपति-उत्सव और शिवाजी उत्सव के माध्यम से राष्ट्र और समाज को एकजुट करने का आह्वान छेड़ा। इस उद्देश्य में तिलक जी को बहुत हद तक सफलता भी मिली।
श्री अजित कुमार ने कहा कि लोकमान्य तिलक ने राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में जो विचार रखे, उसे अपने जीवन और आचरण से सत्यापित किया। तिलक का समय बहुत कठिन था। राष्ट्रीय परिदृश्य में उस समय कई तरह की विचारधाराएं प्रबल थीं। तिलक पुनरुत्थानवादी थे, अंग्रेजी भाषा और चिंतन से परिचित होने के कारण वे समझ रहे थे कि अंग्रेजी शिक्षा भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना के उत्पन्न होने में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। इसलिये उन्होंने वेदों और गीता से ऐसे सूत्र ढूंढ निकाले, जो देशवासियों को ब्रिटेन की दासता से मुक्ति के लिये मानसिक रूप से तैयार करे। गीता-रहस्य का लेखन उन्होंने मराठी भाषा में की, ताकि आम जन गीता के कर्मयोग के विचार में शिक्षित हो सके।
प्रोफेसर अजित कुमार ने कहा कि तिलक देशवासियों में अपनी अस्मिता का बोध और गौरवभाव जगाना चाहते थे। स्वदेशी के बहाने देश को स्वावलंबी बनाना उनका उद्देश्य था। वे मानते थे कि जब हम स्वावलंबी होंगे, तभी हममें स्वयं और राष्ट्र के लिये आत्मगौरव जाग्रत होगा। तिलक लोकभाषा में जनशिक्षा चाहते थे। लेकिन तिलक ने किसी भाषा का विरोध नहीं किया। तिलक के सहकर्मियों में कई मुसलमान भी थे, जो उन्हें अपना वैचारिक गुरु मानते थे। तिलक सनातनधर्मी थे, पर दुनिया के अन्य किसी भी अन्य धर्म के प्रति उनमें अलगाव की सोच नहीं थी। जिनको अंग्रेजी हुकूमत ने भारतीय अशांति का जनक कहा, उनको महात्मा गांधी ने आधुनिक भारत का जनक कहा है। तिलक को हमारे सामाजिक राजनीतिक जीवन में वह स्थान नहीं मिला है, जिसके वे अधिकारी हैं। इस दिशा में अध्येताओं और शोधकर्ताओं को काम करने की आवश्यकता है।
सेमिनार में अपने बीज वक्तव्य में मुजफ्फरपुर में स्वराज्य-पर्व के आयोजनकर्ता और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास, दिल्ली के अध्यक्ष श्री नीरज कुमार ने कहा कि भारतीय स्वराज्य के प्रणेता लोकमान्य तिलक ने ही पहली बार ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूंगा’ का उद्घोष किया था, जिसने स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में भारतीय जनमानस को झंकृत कर दिया था। स्वराज्य के लिये राष्ट्रीय संघर्ष की शक्ति बढ़ाने और सामाजिक एकता को सुदृढ़ करने के लिये 1893 में पुणे से उन्होंने गणपति-उत्सव की शुरुआत की, जो एक राष्ट्रीय अभियान बन गया। मुजफ्फरपुर के साथ तिलक जी का गहरा संबंध था। मुजफ्फरपुर बमकांड और शहीद खुदीराम बोस के पक्ष में केसरी अखबार में लिखे गये उनके लेखों के कारण उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया गया था, और छह साल के कारावास में मांडले जेल भेज दिया गया था। जेल की विषम परिस्थितियों में भी तिलक जी ने ‘गीता-रहस्य’ जैसे महान ग्रन्थ की रचना की। अतः कहा जा सकता है कि मुजफ्फरपुर से संबंध के कारण ही तिलक जी को गीता-रहस्य लिखने का अवसर मिला और वे बाल गंगाधर तिलक से लोकमान्य तिलक बने। उनकी इसी ऐतिहासिक विरासत से प्रेरणा लेकर मुजफ्फरपुर में राष्ट्रकवि दिनकर स्मृति न्यास ने गणपति-उत्सव और स्वराज्य-पर्व मनाने की शुरुआत की है।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव, संस्कृत के अध्येता और प्रोफेसर डॉ. मनोज कुमार ने भी लोकमान्य तिलक के विचारों की प्रासंगिकता पर अपने शोधपूर्ण विचार रखे। रामदयालु सिंह कॉलेज के प्रोफेसर श्री रजनी कान्त पांडेय ने सेमिनार के प्रारंभ में विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि तिलक की जो चिंतन पद्धति है, उनका जो समग्र योगदान है, क्या हम उसे सही परिप्रेक्ष्य में देख पाते हैं? क्या इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है, आज इन्हीं विषयों पर विचार करने के लिये हम इकट्ठा हुए हैं। तिलक के स्वराज्य और गणपति-उत्सव के पीछे जो उनका उद्देश्य था, उसको भी समझने में यह सेमिनार उपयोगी सिद्ध होगा। अंत में रामदयालु सिंह कॉलेज की प्राचार्या और इस सेमिनार की अध्यक्षा डॉ. अमिता शर्मा ने सेमिनार में भाग लेने वाले विद्वान वक्ताओं, शोधार्थियों, प्राध्यापकों और विद्यार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया। सेमिनार का संचालन वरिष्ठ कवि डॉ संजय पंकज ने किया।

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